Sunday, 4 October 2009

उसे साँप ने नहीं काटा था .....

यादों के वातायन में पहुँचता हूँ -करीब ३० साल पहले ! बगल के गाँव से गुजर रहा था ! कुछ भीड़ और चिल्ल पों सुनायी पडी तो मुड़ गया उधर -क्या देखता हूँ कि एक महिला अभुआ (विक्षिप्त ,विश्रिन्खल हो प्रलाप करना )  रही थी  -कई लोग उसे संभाले हुए, मगर वह बार बार लोगों को झटक दे रही थी ! माजरा यह था कि लोगों के अनुसार उसे साँप ने काटा था ! और साँप इसके सर चढ़ भूत जैसा बोल (अभुआ ) रहा था ! मेरी सापों में रूचि शुरू ही  हुई थी ! मगर मेरी बुद्धि जवाब दे रही थी -अजीब सा झांव झांव मचा हुआ था ! मैं महिला के साँप के काटे के निशानों को देखकर साँप के जहरीले या विषहीन होने का फैसला कर लेना चाहता था ! मगर वहां तो कहानी ही दूसरी चल रही थी ! एक ओझा उसे (मतलब महिला रूपी साँप  को ) महिला से दूर हो जाने और कान में बिरई लगाने (एक कथित जडी जिसे कान मे डाला जाता है और दर्द से पीड़ित सब्जेक्ट अनाप शनाप बोलता है -इसे स्थानीय बोली में कबूल्वाना कहते हैं ) का उपक्रम कर रहा था ! मैं हक्का बक्का  सा सारा दृश्य देख रहा था ! कोई मेरी सुने भी तो !

तभी एक बुजुर्ग वहां पधारे ! लोग उन्हें सम्मान  दे रहे थ ! "आईये आईये पंडित जी देखिये बेचारी को साँप काट लिया है -राम ओजरवा क दुल्हिन है " सब लोग सहसा शांत से हो गये -मुझे आज भी याद है कि महिला ने भी घूंघट को संभाल लिया था ." कहो एकरे तो लड़का होवैयाँ बा -ई पेट से बा न " पंडित जी बोले ! लोगों ने स्वीक्रति में सिर हिलाया ! "मगर जौने औरत के पेटे बच्चा होवे ओके त साँप नाई कटतेन "(पूर्वांचल का एक प्रचलित अंधविश्वास ) -पंडित जी उवाच ! इस बात पर वहां स्तब्धता छा  गयी ! अभी तक तो वहां  साँप को बकरवाया ( आत्म स्वीक्रति ) जा रहा था -अब ? ओझा ने ब्रह्म वाक्य सुना ,जनता जनार्दन और उस पीडिता ने भी !

सहसा   पीडिता चिल्लाई " नहीं हम साँप नाही हैं -हम कुछ और हैं ! " "बोलो तब क्या हो,  क्या हो बोलो बोलो नाही त फिर बिरई लगाई जाए " ओझा चिल्लाया ! बेचारी बड़े पशोपेश में अब बताये भी तो क्या ? पंडित जी तो जाने माने विद्वान् उनकी बात ब्रह्मा  की  लकीर कह दिए कि गर्भवती को साँप नहीं काट सकते तो फिर नहीं काट सकते -भले ही बात साँप को मालूम हो या न मालूम हो मगर पंडित जी को तो पता ही है -विचारों की ये ट्रेन पूरी रफ़्तार से महिला के मन  में दौड़ लगा गयी होगी -मैं आज यह सोचता हूँ ! अब बेचारी  को अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए कुछ तो बोलना ही था !अकस्मात बोल पडी -"हमें नेऊर (नेवला ) ने काटा है  ! " भीड़ में अपने दुर्भाग्य से एक बुजुर्ग भी मजमे में आ गये थ संयोग से उनका नाम भी नेउर था (गावों में अब भी ऐसे ऊँटपटांग नाम होते हैं ) -अब उनका मुंह देखने लायक था -बोल पड़े धत्त तेरे की मैं ही तुझे मिला था बदनाम करने के लिए -लोग ठठा के हँस पड़े -मजमा अब हटने लगा था   ........
पुनश्च -यह पोस्ट यहाँ इसलिए कि गाँवों में विभिन्न अत्याचारों को झेलती बिचारी महिलाओं को कभी कभी सर्प दंश का भी झूंठ मूठ बहाना गढ़ना पड़ता है -मगर यह बदनामी तो सापों के हिस्से में आती है न !

Sunday, 6 September 2009

कुछ रोचक सर्प सांख्यिकी !

ड्वार्फ ब्लाईंड स्नेक
सबसे छोटा सांप -बौना अंधा साँप -ड्वार्फ ब्लाईंड स्नेक (लेप्टोटिफ्क्लोप्स ह्यूमिलिस ) जो केवल १०सेमी लंबा होता है ! ब्राह्मणी अँधा साँप (ब्राहमनी ब्लाईंड स्नेक- रैम्फाटिफ्क्लोप्स ब्रेमिनस ) भी केवल १५ सेमी होता है !
सबसे बड़ा साँप -एशियाई रेटीक्यूलाटेड अजगर की लम्बाई सबसे अधिक है -१०.१ मीटर तक
सबसे भारी साँप -हरा एनाकोंडा सबसे भारी होता है और वजन १३० किलो
सबसे विषैला -हुक सरीखे नाक समुद्री साँप एना हाईडरीना शिस्टोसा जो की फारस की खाडी से दक्षिणी एशिया के कई समुद्री क्षेत्रों में पाया जाता है -इसका विष किंग कोबरा से भी १०० गुना ज्यादा घातक है ।
नागराज
सबसे घातक -भारत .वियेतनाम ,दक्षिणी चीन ,फिलीपींस ,मलेशिया तथा इंडोनेशिया में मिलने वाले नागराज विषैले सापों में सबसे बड़े होते हैं -लम्बाई ३ मीटर औसत और ५.५८ मीटर तक की अधिकतम लम्बाई हो सकती है -यद्यपि इसका विष समुद्री साँप से कम विषैला होता है मगर मात्रा बहुत अधिक होती है -इससे निकला विष एक बड़े हाथी को सहज ही मार सकता है !
सबसे छोटा विषैला साँप -नामीबिया में मिलने वाला नारका -ड्वार्फ एडर ( बायिटिस सनाईडेरी ) जो २० सेमी लंबा होता है । गबून वाईपर का विषदंत

सबसे लंबे विषदंत -गबून वाईपर ( बायितिस गोबोनिका ) के विषदंत ५ सेमी के होते हैं ।
सबसे तेज /स्फूर्त साँप -ब्लैक अफ्रीकन माम्बा (डेण्डरोऐस्पिस पालीलेपिस ) १४ -१९ किमी प्रति घंटा की चाल अख्तियार कर सकता है .यह दूसरे नंबर का लंबा विषैला साँप है !
भारतीय चौकडी -नाग - कोबरा ,करैत-बुन्गैरस सिरूलियास ,रसेल वाईपर (डॉबोयिया रसेलाई ) , और सा स्केल्ड वाईपर ( एकिस कैरीनैटस )

Sunday, 30 August 2009

प्राणलेवा ही नहीं जीवनदायी भी है सर्पविष !

यह टपकती है जो इक बूँद : अमृत है या विष
सर्पविष मारता है तो जान भी बख्श देता है -सर्प विष से ही प्रति सर्पविष यानि एंटी वेनम बनाया जाता है जो साँप काटे का शर्तिया इलाज है ! भारत में सर्प विष दशकों से हाफ्किन इंस्टीच्यूट मुम्बई और सेन्ट्रल रिसर्च इंस्टीच्यूटकसौली -हिमांचल प्रदेश में तौयार होता रहा है -पहले यह केवल घोडों को सर्पविष की थोड़ी थोड़ी मात्रा देकर फिर उसके खून से सीरम निकाल कर सुखा कर बनाया जाता था मगर अब यही प्रक्रिया ऊटों पर आजमा कर प्रति सर्प विष का व्यावसायिक उत्पादन किया जा रहा है !

यह तो हुई साँप के काटने की उसी के विष से निकाली गयी जीवनदायी औषधि ,इसके अलावा कोबरा के विष से मांस पेशियों के दर्द का इलाज और न्यूरल लेप्रोसी का इलाज भी करने के अच्छे परिणाम मिले हैं । मिर्गी के इलाज में भी इसे आजमाया गया है .कोबरा का विष कई व्याधियों से उपजे असहनीय दर्द से छुटकारे में भी फायदेमंद पाया गया है .जैसे कैंसर ,न्यूराईटिस , अर्थ्राल्जिया ,न्यूराल्जिया ,माईग्रेन में कोबरा का विष दर्द को छूमंतर कर देता है .वैज्ञानिकों ने पाया है की न्यून मात्रा में कोबरा का विष ब्रेन के उच्च प्रग्यानात्मक केन्द्रों को हानि नही पहुचाता । यह अफीम जैसे दर्दनिवारक का प्रतिस्थानी बन सकता है ।

इसी तरह रसेल वाईपर का विष रक्त को गाढा करने के लिए इस्तेमाल हो सकता है .हीमोफिलिया या अन्य रक्तस्राव के मामलो में इसकी उपयोगिता जांची परखी जा रही है .गर्भाशय और रेटिना से अनियंत्रित रक्तस्राव के समय रसेल वायपर का विष कारगर पाया गया है । इसका तनु द्रव दंतचिकित्स्कों द्वारा लंबे समय से बहु रक्त स्राव को रोकने में इस्तेमाल में लाया जा रहा है । आंतरिक रक्त स्रावों को रोकने में इसके भूमिका असंदिग्ध है ।

होम्योपैथ रैटिल स्नेक के विष का एक प्रेपरेशन मिर्गी ,दमा , न्यूराल्जिया ,न्यूराईटिस ,लम्बैगो ,सियाटिका ,टिक्स , कोकीगोदायनिया ,लैरिन्जायि टिस,प्ल्यूरिसी ,और अनिद्रा के रोगियों में देते आए हैं । करैत का विष भी इन व्याधियों में उपयोगी पाया गया है ।

आयुर्वेद में भी कई रसों के तैयार करने में सर्पविष का सम्पुट दिया जाता है -शुचिकाभरण रस में कोबरा विष की अत्यल्प मात्रा होती है जिसे हैजा और टी बी के इलाज में दिया जाता है .

Tuesday, 25 August 2009

क्या है सापों का शुष्क दंश (ड्राई बाईट )?

वैसे तो लवली जी ड्राई बाईट अब यह कौन सी बला है के उप शीर्षक से यहाँ इस विषय पर संक्षिप्त प्रकाश डाल चुकी हैं -और मैंने तभी यह सोचा था कि इस विषय पर आपको थोड़ा और विस्तार से बताने की जरूरत है ! मुझे याद है वर्ष २००४ में प्रसिद्ध सर्प विशेषग्य रोमुलस व्हिटकर ने " द हिन्दू "में एक साक्षात्कार दिया था जिसमें उन्होंने यह पुष्टि की थी साँप मनचाहे तरीके से कम ज्यादा या बिल्कुल भी नही विष की मात्रा दंश के दौरान शरीर में छोड़ सकता है -यह एक तरह की ऐच्छिक क्रिया है !

मुझे तभी आश्चर्य हुआ था क्योंकि तब तक की मेरी जानकारी के अनुसार सर्प दंश के दौरान विष ग्रंथिओं के पिचकने पर नियंत्रण नही रख सकता क्योंकि विषदंत की पूरी प्रक्रिया-विष दंतों का मनुष्य के शरीर में धंसना और ऊपरी जबड़े का दबना -सिर के दोनों ओर अन्दर मिनिएचर गुब्बारे सदृश दबी विष से भरी थैलियों पर बढ़ता प्रेशर -यह सब एक मेकैंनिकल अनैच्छिक क्रिया है -इंजेक्शन की सिरिंज के माफिक ! मगर सांप इस विष -इंजेक्शन पर ऐच्छिक नियत्रण रखता है यह सचमुच चौकाने वाली बात थी ! मगर व्हिटकर ने कहा था " मैंने हजारो बार सापों का विष निकाल कर यही सीखा है की सर्पदंश एक ऐच्छिक क्रिया है !

ऐच्छिक सर्प दंश का अर्थ तो यह हुआ कि विषैले साँप विष को शरीर में बिना पहुंचाए भी काट सकते हैं .यानि शुष्क काट ! ड्राई बाईट ! ऐसा २० से ३० फीसदी सर्पदंश में पाया गया है कि महज आत्मरक्षा के लिए साँप शुष्क दंश का सहारा ले सकते हैं ! कुछ वैज्ञानिकों का दावा है कि साप अपने भोज्य -शिकार के अलावा सर्प विष जो एक बेहतरीन पाचक एंजायम भी है ,को बरबाद नही करना चाहता ! इसलिए वह बड़े जानवर या मनुष्यों में कम विष ही डालता है या बिल्कुल भी नही डाल सकता ! यह उसकी मर्जी पर है ! वैसे अभी भी इस साँप की इस गतिविधि पर शोध जारी है !


शुष्क काट की जानकारी से जहाँ लोगों की घबराहट को दूर किया जा सकता है वहीं यह खतरा भी है कि लोग ज्यादा विषयुक्त दंश को भी ड्राई बाईट समझने की भूल या लापरवाही कर सकते हैं जो जानलेवा हो सकती है ! इसलिए सर्पदंश चाहे वह शुष्क हो या विषयुक्त -कुशल डाक्टर की देखरेख जरूरी है- लालबुझकड़ी निदान से जान के लेने के देने पड़ सकते हैं ! और हाँ शुष्क दंश से भी गैंग्रीन जैसे दूसरे संक्रमण हो सकते हैं !






Saturday, 25 July 2009

क्यों मनाते हैं नाग पंचमी ?

नागपंचमी का एक आम दृश्य -नाग दर्शन
आज नाग पंचमी है -भारतीय भुजंग पर आज कुछ नाग चर्चा न हो भला यह कैसे हो सकता है -मगर इस ब्लॉग की मुख्य कर्ता धर्ता -माडरेटर लवली कुमारी जी भारतीय भुजंग में मात्र वैज्ञानिक तथ्यों ,जानकारियों को देने की पक्षधर रही हैं और इसके इतर पोस्टों पर वे अपनी तीव्र आपत्ति व्यक्त करती हैं -मगर मैं भारत में नागों और सापों को एक व्यापक दृष्टि से देखता हूँ जिसमें वैज्ञानिक तथ्यों के साथ ही उनके सांस्कृतिक ,मिथकीय संदर्भ भी सम्मिलित है -भारतीय मनीषा सदैव ही जीवन के विविध पहलुओं में समग्र दृष्टि की हिमायती रही है -आशा है लवली जी नागपंचमी पर इस पोस्ट को आपसे साझा करने काअनुमोदन कर देगीं ।

यह तो सच है की वर्षा ऋतु में ही सर्प दंश की अनेक घटनाएँ घटती हैं -लिहाजा हजारो साल पहले से सापों से भयग्रस्त जन इसी माह सापों की पूजा करते आए हैं जिसमें डर भय ही मूल कारण है -भय बिनु होई न प्रीति !
सावन महीने के शुक्ल पक्ष के पाँचवे दिन अर्थात आज ही नाग पंचमी का आयोजन पूरे देश में स्थानिक विशिष्ट पूजा विधान के साथ होता है -एक कथा जिसके उद्भव के बारे में ज्यादा कुछ ज्ञात नही है इस अवसर पर दुहराई जाती है .वह यूँ है -
मणिपुर में एक ब्राह्मण परिवार था जिसके मुखिया ने मनाही के बावजूद नागपंचमी के दिन खेतों को जोतने का निर्णय लिया -( साँप इसी माह बच्चे देते हैं -वैज्ञानिक तथ्य ) -वह हल बैल लेकर खेत पर पहुँचा .खेत जोतना शुरू किया ,तभी अनहोनी जो घटित होनी ही थी घटित हो गयी -एक सद्य प्रसूता नागिन के सभी बच्चे हल के फाल से काल कवलित हो गए ! तभी नागिन आ पहुँची और क्रोध से पागल होकर उसने ब्राह्मण को डस लिया -जो तत्क्षण वहीं ढेर हो गया -उसने जैसे को तैसा नीति के मुताबिक फैसला लिया कि ब्राहमण ने चूंकि उसके पूरे परिवार को मार डाला है इसलिए वह भी उसके परिवार के सभी सदस्यों को मार डालेगी -ब्राहमण के घर पहुँच कर पूरे परिवार को डसने के बाद उसे पता चला कि ब्राह्मण किसान की एक बेटी है जो अपने घर (ससुराल ) गयी है -उसे भी काटने के इरादे से जब वह दूसरे गाँव पहुँची तो क्या देखा कि ब्राहमण की बेटी नाग पूजा का पूरा अनुष्ठान किए बैठी है -और धूप दीप नैवेद्य दूध से नागराज की पूजा कर रही है -यह देख नागिन के मन से बदला लेने का विचार खत्म हो गया .उसने सारा वृत्तांत ब्राहमण बेटी को सुना दिया जिससे वह बहुत दुखी हो गयी ! मगर नागिन ने दयालुता दिखाकर उसे अमृत का कलश सौंप दिया और कहा कि तुरंत जाकर इसे सभी मृतकों पर छिड़को -ब्राहमण बेटी ने वैसा ही किया और उसके माँ बाप ,भाई बहने सब पुनर्जीवित हो गए ! जैसे उस ब्राहमण परिवार की हंसी खुशी लौटी वैसे सबके दिन बहुरे -इसी शुभकामना के साथ कथा का समापन होता है ! (संदर्भ :vogel ,1926 -स्नेक्स आफ इंडिया ,पी जे देवरस के अनुसार )

विकीपीडिया के मुताबिक नागपंचमी के ही दिन भगवान कृष्ण ने कालिया मर्दन किया था -मगर इस कथा का संदर्भ मैंने बहुत खोजा और कहीं नही मिला !

कथा की तार्किक सीख केवल इतना ही है कि सावन में खेतों मेड़ों की निराई गुडाई या जुताई के समय बहुत सावधान रहें -जिससे किसी साँप के बच्चे न तो संकट ग्रस्त हो और नही खेत में काम करने वाला ! यह तथ्य भी इस कहानी में छुपा है कि सावन/जुलाई माह सापों के अंडे बच्चे देने का होता है !

हमारी कथा कहानियाँ किसी न किसी संदेश /सूचना को लिए होती हैं मगर हम उनके मर्म को न देख कर बस अन्धविश्वासी बनकर कर्मकांडों /अनुष्ठानों तक ही सीमित हो जाते हैं -आईये नाग पंचमी पर हमारे किसान भाई यह संकल्प लें कि पर्यावरणके मित्र सापों का पर्यावास हम क्षतिग्रस्त न करें और सावन के महीने में इन जीवों की रक्षा के प्रति विशेष सचेष्ट रहें !

इन पक्तियों को लिखने तक यह आवाजें मुझ तक पहुँचने लगी हैं लो छोटे गुरू को लो बड़े गुरू को लो -बच्चे नागों की तस्वीरें बेच रहे हैं -यह बनारस की एक पुरानी परम्परा है -आज से ही कुश्ती दंगल की प्रतियोगितायें भी यहाँ शुरू हो रही हैं -वन्य जीव अधिनियम १९७२ में स्पष्ट मनाही के बाद भी सपेरे नाग दर्शन करा रहे हैं -पर यह एक अलग कथा है !

Sunday, 19 July 2009

क्या साँप सचमुच बदला लेते हैं ?

सापों के प्रजनन काल में उनसे दूर रहें ! नही तो ..आगे पढ़ें ......
पी जे देवरस की मशहूर पुस्तक 'स्नेक्स आफ इंडिया '(एन बी टी ,नयी दिल्ली ) में एक रोचक वाक़या बयां है -एक बार कई लोगों की भीड़ में वह साँप छोडा गया जिसका रहने का स्थान ,बिल आदि एक व्यक्ति द्बारा उजाड़ दिया गया था -लोगों दंग रह गए जब अनेक लोगों में से साँप उसी के पास जा पहुँचा ! यह विवरण किन्ही मीक नामक सज्जन /लेखक ने अपनी पुस्तक 'क्रीचर्स आफ मिस्ट्री '(१९४६) दर्ज किया है ! क्या यह सम्भव है? देवरस ने इसकी विस्तृत व्याख्या की है -
साँप ख़ुद तो बहुत तीक्ष्ण गंध छोड़ते ही हैं मगर उनमें गंध -पहचान की भी अद्भुत क्षमता होती है.धामन साप बहुत दुर्गन्धयुक्त स्राव निकालता है जो उसे छूने वाले के हाँथ में भी लग जाता है .करैत भी कुछ माहों में एक काले रंग का स्राव अपनी गुदा ग्रंथियों से छोड़ता है .ज्यादातर सर्प मादाएं अपनी गुदा की पश्च ग्रंथियों से स्राव छोड़ती रहती हैं -प्रजनन काल में नर साँप मादाओं से इन्ही गंध के चलते भी आकर्षित होते हैं ! परीक्षणों में यह देखा जा चुका है कि इस ख़ास गंध का पीछा करते करते साँप काफी दूर तक भी जा सकते हैं .इसलिए इस बात के पीछे कुछ कल्पित सत्य है कि साँप अपने दुश्मन या उसके जोड़े को मारने वाले के पीछे जा सकता है -दरअसल वह उस व्यक्ति के साथ या फिर जिस लाठी आदि उपकरण जिससे साँप का जोड़ा मारा गया हो पर लगे गंध के कारण गंध स्रोत का ही पीछा करता है ! ( साँप मारने वाले सावधान -अपनी लाठी आदि साफ़ कर लें या घर से दूर रखें ) ।

अब क्या कुछ साँप प्रजातियाँ जैसे कोबरा जो गंध के प्रति बहुत संवेदनशील होता है मानुष गंध से भी उत्प्रेरित होते हैं यह शोध का विषय है -कुछ मामले प्रकाश में आए हैं जिसमें एक ही व्यक्ति को साँप ने अनेक बार आ कर काटा है -कहीं ये लोग अपनी गंध से तो साँप को आकर्षित नही कर लेते -आख़िर विकास क्रम में सर्प भी तो एक कड़ी है और वह सर्पीली गंध कहीं मनुष्यों तक भी कुछ अवशेषी रूप में संवाहित होती न आयी हो ? बहरहाल यह शोध का विषय है ! अन्तिम रूप से अभी कुछ नहीं कहा जा सकता !

पर हाँ यह सापों का प्रजनन काल है -इस दौरान् उनसे दूर रहने में ही भलाई है -कौन जाने प्रेम गंध की कुछ फुहारें आप तक ही न पहुच जायं और नर साँप आप से ही मिलने को उद्यत न हो जाय !

Monday, 13 July 2009

एक साँप जो घोसला बनाता है !

किंग कोबरा


जी हाँ दुनिया में बस केवल यही साँप घोसला बनाता है ! और यह भी कोई ऐरा गैरा सांप नही बल्कि नागराज है -किंग कोबरा ! यह तीन से छह मीटर तक लंबा हो सकता है -इस तरह दुनिया के सबसे बड़े सापों में शुमार है .
किंग कोबरा वैसे तो भारत में दुर्लभ है मगर पश्चिमी घाट के घने जंगलो और उत्तर भारत के पहाडी भागो में यदा कदा दिख जाता है -यह नीलगिरी की पहाडियों,गोआ ,हिमालय के २००० मीटर की ऊँचाई तक लाहौर से असम तक के विशाल भू भाग में भी यह दिखता है -और बिहार,उडीसा ,पश्चिम बंगाल से अंडमान तक यह पाया जाता है .

प्रसिद्द सर्प विज्ञानी रोम्युलस व्हिटकर इसे आम लोगों की धारणाओं के विपरीत एक शांत स्वभाव और डरपोक साँप मानते हैं -उनसे कई बार इनकी मुठभेड़ हुयी है और हर बार यह डर कर भाग गया है ! यह मुख्य रूप से केवल सांपो को ही खाता है -धामिन और पनिहाँ सांप को ! मद्रास के मशहूर स्नेक पार्क में एक चार मीटर के किंग कोबरा ने चार महीनों में डेढ़ डेढ़ मीटर के पन्द्रह धामन सापों को उदरस्थ कर लिया था ।

एक किंग कोबरा के साथ रोम्युलस व्हिटकर
इसकी विलक्षण खासियत है कि मादा बांस की पत्तियों और कैन के सहारे ३० सेमी ऊंचा शंक्वाकार घोसला बनाती है और अण्डों से बच्चों को निकलने तक समर्पित भाव से सेती है -जब यह घोसला बनाने में तन्मय होती हैं तो बड़ी ही शांत होती है -यहाँ तक कि पास खडे व्यक्ति को भी अनदेखा कर सकती है ! जून माहं में यह अंडे देती है -एक बार में यही कोई बीसेक अंडे !सेने का काम दो माह तक होता है और यह इन दिनों पार्रा निराहार ही रहती है ।


और यह रहा रानी नागराज का घोसला और मुंह निकालते बेबी नागराज

इसका विष वैसे तो साधारण नाग -कोबरा से कम विषैला होता हैं मगर एक पूरे दंश में यह ६ सी सी तक विष निकाल सकता है जो एक हांथी को भी मार सकता है -इस पर इसलिए सर्परोधी अंटीवेनम बहुत कारगर नही है -मगर इसके काटने की घटनाएँ न के बराबर ही हैं !

कौन बडा नागराज या आदमीं ?

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